चिली से लेकर लंदन, कनाडा तक इस समय चोरों का टारगेट तांबे पर चल रहा है.
भारत में मेट्रो, रेलवे, बिजली और टेलीकॉम नेटवर्क से कॉपर केबल चोरी की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं. दिल्ली मेट्रो से लेकर रेलवे और बीएसएनएल तक हाल के महीनों में कई बड़े मामले सामने आए हैं. इसकी बड़ी वजह दुनियाभर में तांबे की रिकॉर्ड कीमतें हैं, जिन्होंने कॉपर चोरी को संगठित अपराध का नया कारोबार बना दिया है. अभी फाइनेंशियल टाइम्स ने एक रिपोर्ट छापी है, जिसके मुताबित दुनिया के कई देशों जैसे चिली, कनाडा, ब्रिटेन में कॉपर की चोरी खूब हो रही है, जिससे बिजली, इंटरनेट और रेल सेवाएं तक प्रभावित हो रही हैं. आइए इस खबर में डिटेल से समझते हैं कि आखिर अचानक ये चोरी क्यों बढ़ गई है. इससे क्या-क्या असल में नुकसान हो रहा है और दुनिया भर की सरकारें इसको रोकने के लिए क्या कर रही हैं.
भारत में क्यों बढ़ रही है कॉपर चोरी?
भारत में हाल के महीनों में मेट्रो, रेलवे, बिजली और टेलीकॉम नेटवर्क से कॉपर केबल चोरी के कई मामले सामने आए हैं. जून के आखिर में दिल्ली के पंजाबी बाग इलाके में दिल्ली मेट्रो लाइन से 32 मीटर कॉपर केबल चोरी हो गई. मामले को गंभीर मानते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने आरोपी को जमानत देने से इनकार कर दिया और कहा कि इस तरह की चोरी से आम लोगों की सुरक्षा और जीवन को गंभीर खतरा पैदा होता है. रेलवे नेटवर्क भी लगातार निशाने पर है. बिहार के दानापुर रेल मंडल में सिग्नल केबल कटने से दोनों लाइनों पर घंटों ट्रेन परिचालन बाधित रहा और कई ट्रेनें तीन से चार घंटे देरी से चलीं. जहानाबाद में 25 हजार वोल्ट क्षमता का ओवरहेड बिजली तार चोरी होने से करीब 35 मीटर तार गायब हो गया, जबकि मोकामा स्टेशन पर सिग्नल केबल कटने से वंदे भारत और जनशताब्दी जैसी ट्रेनों को बीच रास्ते रुकना पड़ा. झारखंड के धनबाद मंडल में आरपीएफ ने सिग्नल केबल चोरी करने वाले गिरोह का भी भंडाफोड़ किया.
टेलीकॉम नेटवर्क भी इससे अछूता नहीं है. जयपुर में बीएसएनएल की करीब डेढ़ करोड़ रुपये कीमत की भूमिगत केबल चोरी के मामले में पांच लोगों को गिरफ्तार किया गया. वहीं नाशिक में पुलिस ने कुछ ही महीनों में भूमिगत तांबे और एल्युमीनियम केबल चुराने वाले कई गिरोहों का पर्दाफाश किया, जिनमें करोड़ों रुपये का माल बरामद हुआ. उत्तर प्रदेश के रायबरेली में भी पुलिस ने भूमिगत बिजली लाइन के लिए रखे करीब 36 लाख रुपये कीमत के बिजली तार बरामद किए.
सिर्फ भारत नहीं, दुनिया में भी गहराया संकट
कॉपर चोरी अब वैश्विक समस्या बन चुकी है. दुनिया के सबसे बड़े तांबा उत्पादक देश चिली में इस साल पुलिस ने “हाई वोल्टेज” नाम से चली जांच में देश के सबसे बड़े कॉपर चोरी रैकेट का भंडाफोड़ किया. जांच में सामने आया कि पिछले पांच वर्षों में अपराधियों ने करीब एक अरब डॉलर का चोरी किया हुआ तांबा बेचा, जिसे शेल कंपनियों और मनी लॉन्ड्रिंग के जरिए चीन तक पहुंचाया गया. चिली में 2025 के दौरान करीब 420 किलोमीटर कॉपर केबल चोरी हुई, जिससे लगभग 2.6 लाख उपभोक्ता प्रभावित हुए. देश की सबसे बड़ी बिजली कंपनी ने इस साल 1,426 चोरी की घटनाएं दर्ज कीं, जो पिछले साल के मुकाबले दोगुनी हैं.
कनाडा में एक प्रमुख टेलीकॉम कंपनी के मुताबिक 2022 के बाद से कॉपर चोरी 700 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ चुकी है और इस साल अब तक 918 घटनाएं दर्ज हुई हैं. ब्रिटेन में सोलर और विंड फार्म से कॉपर चोरी के मामलों में 140 प्रतिशत से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई है. ब्राजील में अब इस धंधे में ड्रग तस्करी से जुड़े संगठित गिरोह सक्रिय हैं, जबकि स्पेन में पिछले साल 65 हजार मीटर से ज्यादा कॉपर केबल चोरी हुई.
कीमतों में उछाल बना सबसे बड़ा कारण
कॉपर चोरी बढ़ने की सबसे बड़ी वजह तांबे की रिकॉर्ड कीमतों को माना जा रहा है. खदानों में उत्पादन संबंधी दिक्कतों और आपदाओं के कारण पिछले साल तांबे की कीमतें 40 प्रतिशत से ज्यादा बढ़कर रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई थीं और इस साल भी ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं. दूसरी ओर निर्माण, ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहन, एआई डेटा सेंटर और बिजली ग्रिड के विस्तार से तांबे की मांग तेजी से बढ़ रही है. इसी वजह से चोर अब बिजली और टेलीकॉम केबल, रेलवे सिग्नलिंग, ईवी चार्जिंग स्टेशन और सोलर-विंड फार्म जैसे अहम ढांचों को निशाना बना रहे हैं. दूरदराज इलाकों में बने सोलर और विंड फार्म सुरक्षा की कमी के कारण आसान निशाना बनते जा रहे हैं.
आर्थिक के साथ-साथ सामाजिक नुकसान भी
कॉपर चोरी का नुकसान केवल चोरी हुए तार की कीमत तक सीमित नहीं रहता. इससे बिजली, इंटरनेट, फोन और रेल सेवाएं ठप हो जाती हैं. ब्रिटेन में पिछले वित्त वर्ष के दौरान केबल चोरी की 111 घटनाओं के कारण ट्रेनों को करीब 1.28 लाख मिनट की देरी हुई और रेलवे को लगभग 68 लाख पाउंड का नुकसान उठाना पड़ा.
रियो डी जिनेरियो पुलिस के अधिकारियों का कहना है कि इस तरह की चोरी से महत्वपूर्ण सार्वजनिक ढांचे पर सीधा असर पड़ता है और समाज को होने वाला नुकसान चोरी हुए तांबे की कीमत से कई गुना ज्यादा होता है. चोरी के बाद तांबे को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर स्क्रैप के रूप में बेच दिया जाता है, जिससे उसे ट्रैक करना बेहद मुश्किल हो जाता है.
सरकारें कैसे कर रही हैं मुकाबला?
कॉपर चोरी पर रोक लगाने के लिए कई देशों ने सख्त कदम उठाए हैं. ब्रिटेन ने 2013 में स्क्रैप डीलरों के नकद भुगतान पर रोक लगाकर लाइसेंस अनिवार्य कर दिया था, जिसके बाद धातु चोरी के मामलों में कमी आई. ब्राजील ने बिजली और टेलीकॉम केबल चोरी पर कड़ी सजा का कानून बनाया है और एक बड़ी ऊर्जा कंपनी ने कॉपर केबल में नैनोटेक्नोलॉजी का इस्तेमाल शुरू किया है ताकि पिघलाने के बाद भी उसकी पहचान की जा सके. वहीं चिली अब इंटरपोल के साथ मिलकर चोरी के तांबे के अंतरराष्ट्रीय खरीदारों की पहचान कर रहा है. अधिकारियों का मानना है कि संगठित नेटवर्क पर लगाम लगाने के लिए देशों के बीच बेहतर समन्वय जरूरी होगा.
अगर भारत के नजरिए से देखें तो भारत में भी कॉपर चोरी अब सामान्य अपराध नहीं रह गई है. मेट्रो, रेलवे, बिजली और टेलीकॉम जैसे महत्वपूर्ण ढांचों को निशाना बनाने वाले गिरोह तेजी से संगठित हो रहे हैं. यदि तांबे की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी रहीं और निगरानी व्यवस्था मजबूत नहीं हुई, तो आने वाले समय में ऐसी घटनाएं और बढ़ सकती हैं, जिसका असर केवल आर्थिक नुकसान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि करोड़ों लोगों की रोजमर्रा की जरूरी सेवाएं भी प्रभावित हो सकती हैं.
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