मिडिल ईस्ट में तनाव के कारण एलएनजी की कीमतें रिकॉर्ड 26 डॉलर के स्तर पर पहुंच गई हैं.

 दुनिया भर में ऊर्जा का बाजार इस वक्त भारी उथल-पुथल से गुजर रहा है. मिडिल ईस्ट में अमेरिका, इजरायल व ईरान के बीच 28 फरवरी से शुरू हुए तनाव ने गैस की सप्लाई चेन को बुरी तरह प्रभावित किया है. खाड़ी देशों से होने वाली सप्लाई में दिक्कत आने की वजह से एशियाई स्पॉट एलएनजी की कीमतें दोगुनी से भी ज्यादा हो गई हैं. दाम 26 डॉलर प्रति मिलियन ब्रिटिश थर्मल यूनिट (mmBtu) तक पहुंच गए हैं. दिसंबर 2022 के बाद से ये गैस की सबसे ज्यादा कीमत है.
इतनी महंगी गैस ने एशिया के कई बड़े देशों का बजट बिगाड़ दिया है. रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल एशियाई देशों की एलएनजी मांग में 3 से 10% तक की गिरावट आने का अनुमान है. सबसे बुरा हाल पूर्वोत्तर एशिया का है. रॉयटर्स की रिपोर्ट में केप्लर डेटा के हवाले से बताया गया है कि चीन की एलएनजी मांग में 6.1 मिलियन टन की भारी गिरावट देखने को मिल सकती है. गैस के ऊंचे दाम की वजह से चीन के सिरेमिक, मेथनॉल व कांच जैसे उद्योगों पर ताला लगने की नौबत आ गई है या उन्हें अपना उत्पादन घटाना पड़ा है. चीन ने अब बाहर से गैस मंगाने के बजाय अपने ही देश में गैस का उत्पादन बढ़ा दिया है. इसके अलावा जापान व दक्षिण कोरिया जैसे देशों में भी गैस की मांग घटी है. वहां इस साल मौसम ठंडा रहा, जिसके चलते बिजली बनाने के लिए गैस की कम जरूरत पड़ी.

भारत में गैस की इतनी मांग क्यों

पूरे एशिया में जहां गैस की मांग घट रही है, वहीं भारत की स्थिति बिल्कुल अलग है. महंगे दाम के बावजूद भारत लगातार स्पॉट एलएनजी खरीद रहा है. भारत के अलावा बांग्लादेश भी गैस खरीद में पीछे नहीं है. बांग्लादेश मुख्य रूप से बिजली बनाने के लिए गैस खरीद रहा है.
एलएसईजी (LSEG) की विश्लेषक श्रुति शाह ने इस बारे में अहम जानकारी दी है. उनका कहना है कि भारत में एलएनजी की मांग मुख्य रूप से सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन व फर्टिलाइजर (खाद) सेक्टर की वजह से बनी हुई है. ये दोनों सेक्टर मिलकर भारत के कुल एलएनजी आयात का लगभग 70% हिस्सा इस्तेमाल करते हैं. यही वजह है कि महंगी होने के बावजूद भारत को गैस खरीदनी पड़ रही है. हालांकि, गैस के दाम बढ़ने का थोड़ा असर भारत पर भी पड़ा है.

मिडिल ईस्ट के तनाव से बड़ा नुकसान

गैस की इन आसमान छूती कीमतों के पीछे सबसे बड़ा कारण मिडिल ईस्ट का तनाव है. रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान के हमलों के कारण कतर के एलएनजी इंफ्रास्ट्रक्चर को भारी नुकसान पहुंचा है. कतर की 17% एलएनजी निर्यात क्षमता ठप हो गई है. हालात इतने खराब हो गए कि कतर एनर्जी को ‘फोर्स मेज्योर’ (असाधारण परिस्थिति) का ऐलान करके अपना निर्यात रोकना पड़ा.
कतर से गैस न मिलने के कारण भारत को भी शुरुआत में कुछ दिक्कतों का सामना करना पड़ा था. गेल के चेयरमैन ने बताया कि शुरुआती दौर में भारत को गैस की खपत सीमित करनी पड़ी थी. लेकिन बाद में गेल व पेट्रोचाइना जैसी कंपनियों ने अपनी ट्रेडिंग टीमों को काम पर लगाया. इन टीमों ने कतर व यूएई से आने वाली सप्लाई का दूसरा विकल्प खोज निकाला. दुनिया के अन्य हिस्सों से एलएनजी मंगाकर भारत ने अपनी सप्लाई को 90 से 95% तक बहाल कर लिया है. कंपनियों को उम्मीद है कि जैसे ही गैस की कीमतें कम होंगी व वैश्विक सप्लाई सुधरेगी, खपत वापस अपने पुराने स्तर पर आ जाएगी.

2027 तक सुधर सकते हैं हालात

अब सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या आने वाले समय में गैस की कीमतों में कोई राहत मिलेगी. इसका जवाब इस बात पर निर्भर करता है कि खाड़ी देशों से गैस की सप्लाई कितनी जल्दी सामान्य होती है. अगर कतर एनर्जी होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते अपना निर्यात फिर से शुरू कर पाती है, तो 2027 तक हालात सुधर सकते हैं. रिस्टैड एनर्जी व केप्लर जैसी एजेंसियों का अनुमान है कि 2027 तक एशिया में एलएनजी की मांग वापस 280 मिलियन टन तक पहुंच सकती है.
लेकिन, राहत की उम्मीद लगाए बैठे लोगों के लिए एक बुरी खबर भी है. जानकारों का मानना है कि कीमतें युद्ध से पहले वाले स्तर पर शायद ही वापस लौटें. केप्लर के मुताबिक, इस साल एशियाई स्पॉट एलएनजी की औसत कीमत 19.30 डॉलर रहेगी, जो 2027 में घटकर 14.90 डॉलर तक आ सकती है. वहीं रिस्टैड का अनुमान है कि अगले साल भी कीमतें 17 डॉलर के आसपास रहेंगी.
वुड मैकेंजी जैसी संस्थाओं ने चेतावनी दी है कि भले ही इस साल के अंत तक सप्लाई सामान्य हो जाए, फिर भी कीमतें ऊंची रहेंगी. इसका एक बड़ा कारण यूरोप है. सर्दियों से पहले यूरोप को अपने गैस के भंडार फिर से भरने होंगे. यूरोप की इसी जरूरत के कारण 2027 तक गैस के बाजार में भारी कॉम्पिटिशन देखने को मिलेगा.
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